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Tuesday, 12 June 2018

प्राक्कथन {prakthan - (aryo ki dincharya)}

प्राक्कथन  {prakthan - (aryo ki dincharya)}


पवित्र हृदय होने पर व्यक्ति को जो आनन्द प्राप्त होता है, उसकी
कल्पना अपवित्र हृदय वाला व्यक्ति कभी भी नहीं कर सकता है । जीवन
में यदि व्यक्ति को सुख व शान्ति की चाहना है तो उसे यह धारणा बदलनी
ही होगी कि रुपया-पैसा कोठी-बँगले व उच्च पद प्राप्त करके ही सुख
शान्ति का लाभ प्राप्त हो सकता है । हमारे जीवन में अनेकों लोग ऐसे
आये जिनके पास सांसारिक वैभव की प्रचुरता होते हुए भी शान्ति का
सर्वथा अभाव है और वे सुख व शान्ति की खोज में किसी साधु व संन्यासी
के पास मन्त्र लेने पहुँचते हैं और साधु वेशधारी अनपढ़ गॅवार व्यक्ति
तन्त्र-मन्त्र के नाम पर उनको जमकर ठगते हैं पर सुख-शान्ति की झलक
भी उनको प्राप्त नहीं होती है, अत: इस अज्ञानता को परे फेंककर सुख
शान्ति के अभिलाषी जन को ईश्वर भक्ति का अपनाना आवश्यक है।
ईश्वर भक्ति का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप केवल ईश्वर
के नाम की माला जपते रहें या मथुरा, काशी, हरिद्वार आदि की यात्रा
कर आयें या गंगा-यमुना में जाकर स्नान कर आयें, यह केवल अज्ञानता
है, ईश्वर भक्ति का शुद्ध स्वरूप यही है कि परमात्मा शुद्ध व पवित्र
है हम भी अपने हृदय को शुद्ध और पवित्र बनायें, इसके लिए आवश्यक
है कि हमारा दैनिक जीवन अधिक उज्ज्वल हो । इसी बात को ध्यान
में रखकर 'आर्यों की दिनचर्या' नामक लघु पुस्तिका सभी आनन्द के
अभिलाषी जनों के कर कमलों में समर्पित की जाती है ।
पाठकगण अवश्य लाभान्वित होंगे ।
पावन जीवन ही सुनो, सर्व सुखों का सार ।
पावनता को देखकर, भार्गे कष्ट अपार ।।।
भागें कष्ट अपार, रोग न बिल्कुल आवे ।।
मन में रहे उमंग, ढंग जीवन का पावें ।।।
कहें स्वदेश समझाय, सभी कुछ हो मन भावन ।।
सब बातों का सार, बनाओ जीवन पावन ।।।

इस प्राक्कथन से हमें बहुत अच्छी सीख मिलती हैं।।।

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