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Wednesday, 13 June 2018

पशुचारण। [Pastoralism]

पशुचारण  [Pastoralism]

इतिहास में एक दौर ऐसा भी आया जब जनसंख्या के
बढ़ने तथा अल्प मात्रा में सामाजिक विकास के होने पर आखेट
एवं भोजन संग्रह करने वाले समूह ने महसूस किया कि केवल
आखेट और कंदमूलों के सहारे जीवन का भरण-पोषण नहीं किया
जा सकता। तब विभिन्न जलवायविक दशाओं में रहने वाले लोगों
ने उन क्षेत्रों में पाए जाने वाले पशुओं का चयन करके उन्हें
व्यवस्थित ढंग से चराने और पालने का कार्य शुरू किया।
श्रम निवेश के द्वारा वह पालतू पशुओं से मांस, ऊन, खाल
दूध आदि प्राप्त करना सीख चुका था। इस प्रकार सभ्यता के
प्रारंभिक चरणों में ही मनुष्य जैविक प्राकृतिक संसाधनों के पालन,
प्रजनन और संरक्षण की ओर उन्मुख हुआ।
पशुचारण और पशुपालन घास भूमियों की मुख्य आर्थिक
क्रियाएँ होती हैं। कुछ क्षेत्रों में ये व्यवसाय जीवन-निर्वाह के
लिए और कुछ क्षेत्रों में व्यापारिक उद्देश्यों के लिए किए जाते
और वैज्ञानिक तरीकों से किया जा रहा है। पशुचारण और
हैं। कहीं यह उद्योग आदिम पद्धतियों से और कहीं आधुनिक
पशपालन में लगे लोगों के रहन-सहन तथा उनके काम करने के
ढंग में काफ़ी अंतर पाया जाता है। अतः पद्धति के आधार पर।
इस व्यवसाय को दो वर्गों में बाँटा जाता है
1. चलवासी पशुचारण (Nomadic Herding),
2. वाणिज्य पशुधन पालन (Commercial Livestock
Rearing)।


1. चलवासी पशुचारण (Nomadic Herding)-
चलवासी पशुचारण जीवन निर्वाह का प्राचीन व्यवसाय रहा है।
चूंकि ये पशुचारक स्थायी जीवन नहीं जीते, इसलिए इन्हें
चलवासी कहा जाता है।
क्षेत्र (Areas)-चलवासी पशुचारण के तीन प्रमुख
से सहारा मरुस्थल, अफ्रीका के पूर्वी तटीय भाग, अरब प्रायद्वीप,
क्षेत्र हैं (i) इसका प्रमुख क्षेत्र उत्तरी अफ्रीका के अटलांटिक तट
इराक, ईरान, अफगानिस्तान होता हुआ मंगोलिया एवं मध्य
चीन तक फैला हुआ है। यह लगभग 5600 वर्ग कि०मी० क्षेत्र
में फैला हुआ है।
(ii) दूसरा क्षेत्र यूरेशिया में टुंड्रा के दक्षिणी सीमांत पर
स्थित है जो पश्चिम में नार्वे व स्वीडन से होता हुआ रूस के
पूर्वी भाग में स्थित कमचटका प्रायद्वीप तक फैला है।
(iii) तीसरा क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटा है तो दक्षिणी गोलार्द्ध
में दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका तथा मेडागास्कर के पश्चिमी भाग में
विस्तृत है।

2. वाणिज्य पशुधन पालन (Commercial Livestock
और Rearing)-वाणिज्य पशुधन पालन अपेक्षाकृत नया व्यवसाय
आने है। इसका प्रचलन आज से लगभग दो शताब्दी पहले तव शुरू
नैदानों हुआ जब दूध, माँस, ऊन तथा खालों जैसे पशु-उत्पादों की माँग
city) बहुत बढ़ गई। इस क्रिया का मुख्य उद्देश्य पशु-उत्पादों को
चारण बेचकर आय कमाना होता है। पशुधन पालन की इस पद्धति में
चारे और जल की तलाश में जगह-जगह नहीं भटकना पड़ता,
ण से बल्कि पशओं को स्थायी फार्मों की विस्तृत चरागाहों पर आधुनिक
जसमें वैज्ञानिक ढंग से पाला जाता है। वाणिज्य पशुधन पालन पश्चिमी
संस्कृति से प्रभावित है जिसमें पूंजी और तकनीकी ज्ञान महत्वपूर्ण
भूमिका निभाते हैं।

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