ओलम्पिक आन्दोलन द्वारा मूल्यों का विकास [Development of Values through Olympic Movement]

ओलम्पिक आन्दोलन द्वारा मूल्यों का विकास
[Development of Values through Olympic
Movement]
यदि हम डी० कोबरटीन द्वारा निर्मित ओलम्पिक खेलों के
विभिन्न उद्देश्यों पर एक दृष्टिपात करें, तो हमें तुरन्त यह पता
चलता है कि डी०कोबरटीन ओलम्पिक आन्दोलन के द्वारा
मूल्यों को विकसित करना चाहता था। इसलिए उसने ओलम्पिक
खेलों को प्रारम्भ करने के लिए जटिल प्रयास किए। वास्तव में
ओलम्पिक आन्दोलन के द्वारा निम्नलिखित मूल्यों को विकसित
किया जा सकता है
1. मैत्री (Friendship)–ओलम्पिक आन्दोलन ऐसे अनेक
अवसर प्रदान करता है जिनके द्वारा न केवल प्रतियोगियों
के बीच, अपितु राष्ट्रों के मध्य भी मैत्री विकसित होती
है। जब ओलम्पिक खेलों का आयोजन होता है तो प्रतियोगी
एक-दूसरे के निकट आते हैं। वे मित्र बन जाते हैं। ऐसे
राष्ट्र जिनके सम्बन्ध तनावपूर्ण होते हैं वे भी एक-दूसरे के
निकट आते हैं। ऐसे उदाहरणों में से एक चीन का उदाहरण
भी है।''पिगपाँग डिप्लोमेसी'' के परिणामस्वरूप लम्बी
अवधि के पश्चात् चीन ने ओलम्पिक खेलों में भाग
लेना प्रारम्भ किया। इसलिए यह कहा जा सकता है कि
ओलम्पिक आन्दोलन मैत्री को विकसित करने के अनेक
अवसर प्रदान करता है।
2. भाईचारा या बन्धुभाव (Solidarity)–ओलम्पिक
आन्दोलन भाईचारे या बन्धुभाव को भी बढ़ाने के बहुत से
अवसर प्रदान करता है। यह विभिन्न राष्ट्रों के मध्य भाईचारे
व एकता की भावना प्रदान करता है। यह प्रतियोगियों में,
राष्ट्रों की तरह ही सामंजस्य पैदा करता है।
3. निष्पक्ष खेल (Fair Play) कुछ सीमा तक यह कहा
जा सकता है कि ओलम्पिक खेल निष्पक्षतापूर्ण खेल के
अवसरों को बढ़ाते हैं। निष्पक्ष खेल, न्याय पर आधारित
होता है। प्रत्येक खिलाड़ी तथा टीम के साथ न्याय होना
चाहिए। किसी टीम की तरफ किसी प्रकार का झुकाव
नहीं होना चाहिए। प्रत्येक टीम पर नियमों व विनियमों
को निष्पक्ष रूप से लागू किया जाना चाहिए, लेकिन
वास्तव में खेल अधिकारियों की कथनी व करनी में
काफी अन्तर होता है। आजकल प्रत्येक टीम हर तरह के
हथकंडे अपनाकर जीत हासिल करना चाहती है। ऐसे नारे,
जैसे—“खेलों के लिए रुको, न्यायालयों से बाहर रहो
(Stay for Sports, Stay out of Courts)'' तथा
“नियमों में रहो या बाहर हो जाओ (Live by code
or get out)'' व्यर्थ हो चुके हैं, क्योंकि ये नारे प्रयोग
में नहीं लाए जाते। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि
इस बारे में ओलम्पिक आन्दोलन उतना सफल नहीं हुआ
जितना इसे होना चाहिए था।
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के अन्तिम उद्देश्य में यह कहा
4. भेदभाव से मुक्ति (Free of discrimination)
गया है कि जाति, नस्ल व धर्म के आधार पर किसी प्रकार
का भेदभाव नहीं होगा। अतः ओलम्पिक आन्दोलन इस
पहलू पर काफी बल देता है। इसलिए कुछ सीमा तक
ओलम्पिक खेल भेदभाव से मुक्त हैं। ऐसे स्थान पर जाति,
नस्ल, धर्म या समुदाय का कोई अर्थ नहीं होता। हालाँकि
अपवाद हमेशा होते हैं । सन् 1972 के म्यूनिख ओलम्पिक
निर्दयता से मौत के घाट उतार दिया गया था। सन् 1936
खेलों में ऐसा घटित हुआ जब 11 इजरायली खिलाड़ियों को ।
के बर्लिन ओलम्पिक खेलों के दौरान भी नस्ली भेदभाव
देखा गया था जब अडोल्फ हिटलर ने नीग्रो ऐथलीट,
जैस्सी ओवन्स को सम्मानित करने से इंकार कर दिया था,

जिसने उस ओलम्पिक में चार स्वर्ण पदक प्राप्त किए थे।

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