सत्यनारायण व्रत भाग 2


सत्यनारायण व्रत भाग 2
सूतजी पुनः बोले कि एक दिन वह ब्राह्मण अपने बन्धु
बान्धुवों के साथ बैठे ध्यान मग्न हो श्री सत्यदेव की कथा सुन
रहे थे। तभी भूख-प्यास से व्याकुल एक लकड़हारा वहां जा ।
पहुंचा। वह भी भूख प्यास भूलकर कथा सुनने बैठ गया। कथा ।
की समाप्ति पर उसने प्रसाद ग्रहण किया और जल पिया। फिर
उसने ब्राह्मण से इस कथा के बारे में पूछा तो उसने बताया कि
यह सत्यनारायण जी का व्रत है जो मनोवांछित फल देने वाला।
है। पहले मैं बहुत दरिद्र था। इस व्रत के प्रभाव से ही मुझे यह
सब वैभव प्राप्त हुआ है। यह सुनकर लकड़हारा बहुत प्रसन्न
हुआ और मन-ही-मन श्री सत्यनारायण के व्रत और पूजन
का निश्चय करता हुआ लकड़ी बेचने के लिए बाजार की ओर
चल पड़ा। उस दिन लकड़हारे को लकड़ियों का दुगुना दाम
मिला। उन्हीं पैसों से उसने केले, दूध, दही आदि पूजन की
तमाम सामग्री खरीद ली और घर चला गया। घर पहुंचकर
उसने अपने कुटुम्बियों और पड़ोसियों को बुलाकर विधिपूर्वक
सत्यनारायण का पूजन किया। सत्यनारायण की कृपा से वह ।
थोड़े ही दिनों में सम्पन्न हो गया।
सूतजी ने फिर कहा कि प्राचीनकाल में उल्कामुख नाम
धर्मनिष्ठ थे। एक समय राजा-रानी भद्रशीला नदी के किनारे
का एक राजा हो गया है। वह और उसकी रानी दोनों बड़े।
श्री सत्यनारायण की कथा सुन रहे थे कि एक बनिया भी वहां ।
आ पहुंच गया। उसने रत्नों से भरी अपनी नौका को एक ।
किनारे पर लगा दिया और स्वयं पजा की जगह पर गया। वह
का चमत्कार देख उसने राजा से इसके बारे में पूछा। राजा ने
गत वारों के व्रत
गया कि हम विष्णु भगवान का पूजन कर रहे हैं। यह व्रत
अभी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला है। राजा के वचन सुने
और प्रसाद पा बनिया अपने घर चला आया।
घर पहुंचकर उसने अपनी पत्नी से व्रत का सब वृत्तान्त
कहा और संकल्प किया कि मैं भी सन्तान होने पर यह व्रत
करूंगा। उसकी पत्नी का नाम लीलावती था। सत्यदेव की कृपा
से वह कुछ ही दिनों बाद गर्भवती हो गई और दस महीने पूरे
होने पर उसने एक कन्या को जन्म दिया। कन्या का नाम
कलावती रखा गया और वह चन्द्रमा की कलाओं के समान
नित्यप्रति बढ़ने लगी। एक दिन अवसर पाकर लीलावती ने
अपने पति को सत्यदेव का व्रत करने की बात याद दिलाई तो
उसने कहा कि मैं यह व्रत कन्या के विवाह के समय करूंगा।
यह कहकर बनिया अपने कारोबार में लग गया। जब कन्या
विवाह के योग्य हो गई तो उसने दूतों द्वारा खोज कराकर
कंचनपुर नगर के एक बनिये के सुन्दर सुशील और गुणवान
बालक के साथ विवाह कर दिया। फिर भी बनिय ने सत्यनारायण
का व्रत नहीं किया। इससे श्री सत्यनारायण अप्रसन्न हो गये।
कुछ दिनों बाद बनिया अपने दामाद को साथ लेकर समुद्र
के किनारे रत्नसारपर में व्यापार करने लगा। एक दिन
(नसारपुर के राजा चन्द्रकेत के खजाने से चोरों ने बहुत सा
पन चुरा लिया। राजा के सिपाही चोरों का पीछा कर रहे थे।
नै जब देखा कि सिपाहियों से बचना कठिन है तो उन्होंने...

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